गुरु चांडाल दोष तब बनता है जब कुंडली में गुरु (बृहस्पति) की युति राहु या केतु से किसी भी भाव या राशि में हो जाती है। गुरु ज्ञान, धर्म, सद्बुद्धि और नैतिकता का कारक ग्रह है, जबकि राहु-केतु भ्रम, माया और असंतुलन का प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए इस युति से गुरु की शुभ शक्ति दूषित हो जाती है। इसके प्रभावस्वरूप व्यक्ति में भ्रमित सोच, गलत निर्णय, शिक्षा में बाधा, गुरु या पिता से मतभेद, आर्थिक अस्थिरता, समाज में मान-सम्मान की कमी तथा मानसिक तनाव देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से यदि यह युति लग्न, पंचम, नवम या दशम भाव में हो और गुरु निर्बल अवस्था में हो तो दोष अधिक प्रभावी होता है। हालांकि यदि गुरु बलवान हो या शुभ दृष्टि से युक्त हो, तो यही योग व्यक्ति को परंपरा से हटकर शोध, ज्योतिष, तंत्र, आध्यात्म या विदेशी विषयों में विशेष सफलता भी दे सकता है।
इस युति में गुरु की सात्त्विक शक्ति दूषित हो जाती है, इसलिए इसे चांडाल (अधार्मिक प्रवृत्ति) कहा गया है।
मानसिक व वैचारिक प्रभाव
- भ्रमित सोच, गलत निर्णय
- गुरु, धर्म या परंपरा से विद्रोह
- आधा-अधूरा ज्ञान, दिखावटी विद्वता
शिक्षा व ज्ञान
- पढ़ाई में रुकावट
- बार-बार विषय बदलना
- गुरु या शिक्षक से मतभेद
करियर व धन
- गलत सलाह से नुकसान
- अनैतिक या शॉर्ट-कट वाले कार्य
- धन टिकता नहीं
पारिवारिक व सामाजिक
- पिता/गुरु से मतभेद
- समाज में मान-सम्मान की कमी
- विवाह में विचारों का टकराव
स्वास्थ्य (चिकित्सा ज्योतिष दृष्टि)
- लिवर, मोटापा, हार्मोन असंतुलन
- मानसिक तनाव, नशे की प्रवृत्ति






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